Tuesday, February 25, 2014

कुर्सी और कविता



कुर्सी जीने नहीं देती
कविता मरने नहीं देती 

चारों पायों ने  मिलकर जकड़ रखा है 

उड़ने को बेताब कदमों को 


हाथों में थमी कलम 

दौड़ने को बिकल 

कल्पना की घाटी में 

जहां फूलों की महक में कोई सन्देश छुपा है 

जहां पंछियों के कलरव में मधुर संगीत गूंजा है 

अभी-अभी जहां बादलों ने सूरज से आंखमिचौली खेली है 


वो प्यारी सी रंगीन डायरी 

जाने कब से उपेक्षित है
धूल से सनी कोने पे पड़ी

हर रोज नजर आती है 

और मैं नजरें चुरा लेती हूँ 


फाइलों के ढेर में दबी जा रही कविता

टूटती साँसों के बीच अचानक 

कहीं दूर से इक हवा का झोंका 

डाकिया बन कानों में कुछ कह जाता है 


बंद लिफ़ाफ़े  की खिड़की से झांक

खिलखिला उठती है किताबें

किताबों में पाकर अपनी खोई सहेलियों को 

फिर से जी उठती है कविता 


सारे बंधनों  के बीच भी  

आजादी के कुछ पल पा लेती है कविता

कितना ही बाँधे कुर्सी 

उड़ान भर लेती  है कविता |


कमला निखुर्पा २३.०२.२०१४





1 comment:

सहज साहित्य said...

जीवन -सत्य से रूबरू कराती कविता । आपकी विशेषता है बड़ी से बड़ी बात को बहुत्सादगी से कहकर दिल को छू लेना । 'कुर्सी और कविता' इस तथ्य की गवाह है।